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DURGA BHAWANI ASTROLOGICAL SERVICES PVT. LTD

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श्रीमद्भगवद् गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है -

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्ण संकरः । संकरो नरकायैवं कुलहनानां कुलस्य च । अर्थात् स्त्रियों के व्यभिचारिणी होने पर वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न होती है । यह वर्ण संकर संतान कुल का नाश करने वाली एवं समस्त कुल के लिए नरक का मार्ग प्रशस्त करने वाली होती है । वर्णसंकर संतान श्राद्धादि कर्म की अधिकारी न होने के कारण पिण्ड - तर्पण आदि न करने से पितर तृप्त नहीं होते । इस प्रकार मनुष्य के दोनों लोक बिगड़ जाते हैं । जैसे आम आदि वृक्षों में दूसरी जाति के पौधों की कलम लगाने पर उनसे प्राप्त फूल विभिन्न होते हैं । किन्तु इस प्रकार से तैयार किए गए वृक्ष में दूसरे वृक्ष उगा सकने की सामर्थ्य नहीं रहती । इस प्रकार कलम द्वारा तैयार वृक्ष नष्ट होने के साथ ही अपनी प्रगति को भी नष्ट कर देते हैं । जिस देश में वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होने लगेगी , उस देश का गौरव उसकी राष्ट्रीयता खतरे में पड़ जाएगी । यही कारण है कि विजातीय , असवर्ण विवाह पद्धति को सनातन धर्म ने मान्यता प्रदान नहीं की । इस विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु learn more पर क्लिक करें !

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जानिए हमारे शास्त्रों में प्रेम विवाह की अनुमति क्यों नहीं है?

वर्तमान वैज्ञानिक युग में मनुष्य भौतिक संसाधनों की चमक - दमक में इस प्रकार अंधा हो गया है कि अपने प्राचीन आत्मिक सौन्दर्य को नजरअन्दाज करके बाहरी चमक - दमक एवं शारीरिक सौन्दर्य पर आकर्षित होकर प्रेम विवाह को अधिक महत्व देने लगा है । आज की नई शिक्षा पद्धति एवं संचार के नवीन माध्यमों से नया शिक्षित वर्ग पूर्ण रूप से गंधर्व विवाह ( प्रेम विवाह ) को मान्यता देने लगा है । आज अनेक विद्वान एवं धर्माचार्य भी इसकी वकालत में जुट गए हैं और तर्क दे रहे हैं कि विवाह से पूर्व स्त्री - पुरुष के बीच आपसी प्रेम , मेल - मिलाप होना आवश्यक है । जब वे आपस में पूर्ण रूप से परिचित हो जाएं , एक - दूसरे को पूर्ण रूप से जान लें तभी उन्हें विवाह सूत्र में बंधना चाहिए । इस प्रकार लोगों में यह एक धारणा बन गई है कि जब दो विपरीत लिंगियों में प्रेम हो गया है तो दोनों का विवाह होना ही चाहिए । तो क्या यह कहना उचित होगा ? जानने के नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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क्या आप जानते हैं पत्नी का स्थान वाम अंग में ही क्यों होता है ?

पौराणिक आख्यानों के अनुसार ब्रह्माजी के दाएं स्कंध से पुरुष की ओर बाएं स्कंध से स्त्री की उत्पत्ति हुई है । यही कारण है कि स्त्री को वामांगी भी कहा जाता है और विवाहोपरान्त उसे पति के बाएं भाग की ओर बैठाए जाने की परम्परा है । यद्यपि सप्तपदी होने पर वधू को दाई ओर बैठाए जाने का विधान है , क्योंकि तब तक वह पत्नी के रूप में पूरी तरह स्थापित नहीं हो चुकी होती । प्रतिज्ञाओं से बद्ध हो जाने के बाद जब स्त्री पत्नी के रूप में पूरी तरह स्थापित हो चुकी होती है तो उसका स्थान पति के दाई ओर से बाईं ओर कर दिया जाता है ।  प्राप्त जानकारी को विस्तार से जानने हेतु नीचे👇 दिए गए लिंक पर क्लिक करें ।

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जानिए क्या होता है समावर्तन संस्कार ?

समावर्तन संस्कार विद्यार्थी जीवन समाप्त कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करन का प्रतीक है । ऋग्वेद ( 3 / 8 / 4 ) में कहा गया है कि- युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः । तं धीरासः कवय उन्नयंति स्वाध्ययो: मनसा देवयंतः । ।  अर्थात :- उत्तम वस्त्र धारी युवा (ब्रह्मचारी)  विद्या से विभूषित होकर जब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है तो मंगल शोभा वाला होता है । उसे धीर ,बुद्धिमान, विद्वान लोग उत्तम ध्यान युक्त मान्य से विद्या प्रकाश की भावना से उच्चासन देते हैं । अधिक जानकारी के लिए नीचे 👇 दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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क्या आप जानते हैं सगोत्र में विवाह क्यों नहीं करना चाहिये ?

विवाह से पूर्व गोत्र पूछने की परंपरा सदियों से आज तक चली आ रही है । आपने कई बार आज कल की युवा पीढ़ी को यह बात कहते सुना होगा की कुंडली , जात-पात , गोत्र , धर्म , बिरादरी सब कुछ मिलाया जाता है एक रिश्ता बनाने से पहले और कहते हैं की जोड़ियाँ तो उपर वाला बनाता है ! (अब यह बात सही है या गलत मेरा मुद्दा आज यह नहीं है ) परन्तु आज मैं आपको यह बताऊंगा की वास्तविकता में इन सब बातों पर विवाह से पूर्व क्यों विशेष ध्यान दिया जाता है और क्या है इस बात के पीछे का वैज्ञानिक महत्व ! इसके पीछे उद्देश्य यही है कि एक समान गोत्र में विवाह न हो । विवाह सदैव अपने से भिन्न गोत्र में ही करना चाहिए । शास्त्रों में सगोत्रीय विवाह को निंदित , व धर्मविरुद्ध माना गया है । इस विषय में बहुत अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें !

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क्या आप जानते हैं महिलाएं मांग में सिन्दूर क्यों लगाती हैं?

मांग में सिन्दूर भरना सुहाग का प्रतीक माना जाता है । जहां यह मंगलदायी है , वहीँ इससे स्त्रियों के सौन्दर्य में भी निखार आ जाता है । यह एक वैवाहिक संस्कार भी है । विवाह के अवसर पर वर वधू की मांग को चुटकीभर सिन्दर से भरता है । इसके बाद वधु अपने पति की दीर्घायु की कामना करते हए जीवन भर अपनी मांग में सिन्दूर भरती है । अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु 🌎LEARN MORE पर क्लिक करें

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*विवाह से सम्बंधित जानकारी*

हिंदू संस्कृति में विवाह कभी न टूटने वाला एक परम पवित्र धार्मिक संस्कार है । यह दो आत्माओं का पवित्र बंधन है , जिसका उद्देश्य मात्र इंद्रियसुख भोग नहीं , बल्कि पुत्रोत्पादन , संतानोत्पादन कर एक परिवार की नींव डालना है । ऋषि श्वेतकेतु का एक संदर्भ वैदिक साहित्य में आया है कि उन्होंने मर्यादा की रक्षा के लिए विवाह प्रणाली की स्थापना की और तभी से कुटुंब व्यवस्था का श्रीगणेश हुआ । आजकल बहुप्रचलित और वेदमंत्रों द्वारा संपन्न होने वाले विवाहों को ब्राह्म विवाह कहते हैं। विवाह कितने प्रकार के होते हैं एवं विवाह के संबंध में ऐसी ही रोचक बातें जानने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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क्या आप जानते हैं की मल मूत्र त्याग के समय जनेऊ को कान पर क्यूँ लपेटा जाता है ।

और क्या है सही तरीका जनेऊ को कान में रखने का ऐसे ही महत्त्वपूर्ण जानकारी को जानने हेतु नीचे 👇 दिये गए लिंक पर क्लिक करें।

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क्या आप जानते हैं विद्या आरंभ संस्कार क्यों किया जाता है ?

पूरे विश्व में जहां विद्या अध्यापन के नाम पर केवल संस्कृतियों का उत्पादन किया जा रहा था ऐसे समय में भारत वर्ष के भीतर शिक्षा की नींव रखी जा चुकी थी उस समय भारत के अंदर 16 सौ से भी अधिक गुरुकुल माने जाते थे जहां माता-पिता अपने अपने बच्चों को शिक्षा सहित संस्कारों का भी प्रतिपादन करना भली-भांति सीखाने के लिए इन्हे गुरुकुलों में भेजा करते थे। जहां से इनके जीवन की नई शुरुआत होती थी ऐसी स्थिति में जहां यह विद्या का शुभारंभ करते थे व संस्कारों को ग्रहण कर अपने घर आते थे उससे पूर्व यथा विधि जातक को ईश्वर का नाम लेकर सरस्वती की आराधना कर विद्यालय में भेज विद्या का शुभारंभ करना ही विद्यारंभ संस्कार कहलाता था। तो आइए जानते हैं विद्यारंभ से संबंधित ऐसी ही कुछ रोचक जानकारियों को 👇 नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके

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महाशिवरात्रि का क्या अर्थ है ?

हर चंद्र मास का चौदहवाँ दिन अथवा अमावस्या से पूर्व का एक दिन शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक कैलेंडर वर्ष में आने वाली सभी शिवरात्रियों में से, महाशिवरात्रि, को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, जो फरवरी-मार्च माह में आती है। इस रात, ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य भीतर ऊर्जा का प्राकृतिक रूप से ऊपर की और जाती है। यह एक ऐसा दिन है, जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद करती है। इस समय का उपयोग करने के लिए, इस परंपरा में, हम एक उत्सव मनाते हैं, जो पूरी रात चलता है। पूरी रात मनाए जाने वाले इस उत्सव में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि ऊर्जाओं के प्राकृतिक प्रवाह को उमड़ने का पूरा अवसर मिले – आप अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए – निरंतर जागते रहते हैं। भक्ति पूर्वक उस रात्रि को भगवान शिव को ही समर्पित कर देने का नाम महाशिवरात्रि है। महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है? पौराणिक कथाओं के मुताबिक महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे. इसी दिन पहली बार शिवलिंग की भगवान विष्णु और ब्रह्माजी ने पूजा था. मान्यता है कि इस घटना के चलते महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग की विशेष पूजा की जाती है. वहीं, माना यह भी जाता है इसी दिन भगवान शंकर एवं माता पार्वती का शुभ विवाह भी संपन्न हुआ था। महाशिवरात्रि से जुड़े ऐसे ही रोचक तथ्य जानने के लिए एवं क्या है इस वर्ष का महाशिवरात्रि पर्व का शुभ मुहूर्त जानने के लिए 👇 नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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