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DURGA BHAWANI ASTROLOGICAL SERVICES PVT. LTD

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जानिए क्या है पूजा करने का महत्व !

पूजा शब्द की उत्पत्ति पूज् के साथ ल्युट प्रत्यय लगने से हुई है । जिसका अर्थ है - आराधना करना , अर्चना करना , सादर स्वागत करना , सम्मान करना , श्रद्धापूर्वक भेंट चढ़ाना । सगुणोपासना में पूजा का बड़ा महत्व है । पूजन का प्रचलन वैदिक काल से ही रहा है जिसमें इन्द्र , वरुण , अग्नि , सूर्य , रुद्र आदि देवताओं की पूजा होती है और इनसे अद्भुत परिणाम प्राप्त होते हैं । प्राचीन परम्परा के अनुसार हमें देवार्चन की दो विधियां प्राप्त होती हैं - 1 . योग , 2 . पूजा ।

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राहु के रत्न गोमेद के विषय में वीडियो के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने हेतु नीचे दिए गए लिंक पर…

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जानिए क्यों लिया जाता है संन्यास आश्रम ?

श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण संन्यासी के लिए की गई व्यवस्थाओं के बारे में कहते हैं कि जो मनुष्य कर्म फल की इच्छा न करके करणीय कर्म करता है , वही संन्यासी और योगी है । भारतीय मनीषियों ने जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष बताए हैं । इनमें मोक्ष - प्राप्ति का साधन संन्यास आश्रम ही है । मनुस्मृति ( 6 / 33 ) में महाराज मनु ने कहा - चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा संगान्परिव्रजेत् ॥ अर्थात् आयु के चतुर्थ भाग . में सभी प्रकार के माया - मोह को त्यागकर संन्यास ग्रहण करना चाहिए । संन्यासी का ध्येय मोक्ष प्राप्ति होता है । इस बारे में मनुस्मृति ( 6 / 49 ) में कहा गया है- अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः । आत्मनैव सहाय्येन सुखार्थी विचरेविहः ॥ अर्थात् संन्यासी को सदा आत्म चिन्तन में लगे रहना चाहिए । उसे विषय - वासनाओं की इच्छा से रहित निरामिष होकर देह की सहायता से मोक्ष - प्राप्ति का अभिलाषी होकर संसार में विचरण करना चाहिए । इस विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए Learn more बटन पर क्लिक करें !

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जानिए वानप्रस्थ आश्रम के बारे में

नमस्कार मित्रों ,                         मैं जितेन्द्र सकलानी एक बार पुन: प्रस्तुत हुआ हूँ आप लोगो के समक्ष अपने नए ब्लॉग के साथ अपने धर्मग्रंथो पर आधारित कुछ बताये गए  वाक्य, अथवा नियमो के विषय में कुछ जानकरी लेकर.... मित्रों आपने बहुत से धर्मिक ग्रंथो को पढते या टेलीकास्ट एपिसोड को देखते  हुए सुना होगा की पहले  के राजा महाराजा लोग या कोई भी जन सामान्य अपने राज्य कार्यों का त्याग कर एक अवस्था के बाद वानप्रस्थ की और प्रस्थान करते थे और धार्मिक ग्रंथो में भी इन चार प्रकार के आश्रम के बारे में पढने को मिलता है सर्वप्रथम ब्रहमचर्य आश्रम , गृहस्थाश्रम ,  वानप्रस्थ आश्रम एवं संन्यास आश्रम  , ब्रहमचर्य आश्रम में स्पष्ट है की जातक को ब्रहमचर्य आश्रम में रहकर ब्रहमचर्य का पालन करते हुए शिक्षा दीक्षा को ग्रहण करना होता है ! गृहस्थाश्रम में आने के बाद उन्हें अपने घर गृहस्थी  में रहते हुए किन-किन मर्यादाओं का पालन करते हुए निर्वाह करना है , ना केवल अपना अपितु समस्त परिवार का धर्मपरायण होकर एवं ईश्वर भक्ति में लीन रहते हुए कैसे पोषण करना है बताया जाता है परन्तु आज हम जानेंगें की कैसे गृहस्थाश्रम, के त्याग के पश्चात व्यक्ति विशेष वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण करता है  और इसमें क्या क्या करना अनिवार्य हैं इसके क्या नियम हैं और क्यों ? इस विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए LEARN MORE बटन पर क्लिक करें

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जानिए छोछक व भात क्यों दिया जाता है ?

विधिवत् ब्याहता पुत्री के पुत्र होने पर उस बच्चे के लिए ननिहाल पक्ष की ओर से वस्त्र , आभूषण आदि भेंट किए जाते हैं । इस अवसर पर लड़की , दामाद तथा ससुराल के अन्य मान्य लोगों के लिए भी वस्त्र और भेंट के रूप में धन आदि दिया जाता है । समाज में इस परंपरा को छोछक कहते हैं । यह परंपरा बच्चे के नामकरण वाले दिन पूरी की जाती है । अधिकांश घरों में संतान चाहे पुत्र हो या पुत्री माता के मायके वाले छोछक अवश्य देते हैं । पुत्री के बेटे या बेटी के विवाह के समय भी ननिहाल पक्ष की ओर से ऐसी ही रस्म निबाही जाती है । इसे भात देना कहते हैं । इस विषय में और अधिक जाने हेतु LEARN MORE बटन पर क्लिक करें !

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आइये जानते हैं विवाहा में वर - वधू कौन सी प्रतिज्ञाएं लेते हैं और क्यों ?

विवाह की सभी रस्में पूर्ण हो जाने के बाद वर - वधू को अपने कर्तव्य पालन हेतु । संकल्प के रूप में अलग - अलग प्रतिज्ञाएं दिलाई जाती हैं । विवाह संस्कार पद्धति के अनुसार ये सब प्रतिज्ञाएं दांपत्य - जीवन को खुशहाल एवं दीर्घजीवी बनाए रखने के लिए कराई जाती हैं । वर - वधू के लिए वेद में कहा गया है-- सहनाभवतु सहनौ भुनक्तु सहवीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।। अर्थात् हम परस्पर रक्षा करें । साथ भोजन करें । साथ परिश्रम करें । कभी द्वेष व कलह न करें । इस विषय में और अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु LEARN MORE पर क्लिक करें

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जानिए विवाह में क्या है सप्तपदी का महत्व ?

सात परिक्रमाएं करके सप्तपदी की रस्म पूरी की जाती है । इसके लिए वर - वधू साथ - साथ पहले से बना दी गई चावल की सात ढेरियों को पैर से छूते हुए एक - एक कदम आगे बढ़ाते हैं । रुकते हैं , फिर आगे बढ जाते हैं । इस विषय में और अधिक जानने हेतु learn more पर क्लिक करें

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सनातनधर्म में अग्नि के ही सात फेरे क्यों लिए जाते हैं ?

यज्ञाग्नि के चारों ओर परिक्रमा करने को फेरे या भांवर फिरना कहते हैं । यूं तो शास्त्रों के अनुसार यज्ञाग्नि की चार परिक्रमाएं करने का विधान है , लेकिन लोकाचार की दृष्टि से सात परिक्रमाएं करने की प्रथा है । ये सात फेरे विवाह संस्कार के धार्मिक आधार व अटूट विश्वास के प्रतीक है । इस विषय में और अधिक जानकारी हेतु learn more पर क्लिक करें !

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जानिए विवाह के समय गठबंधन क्यों किया जाता है ?

पाणिग्रहण के बाद वर के कंधे पर डाले गुलाबी दुपट्टे से वधू की साड़ी के एक कोने की गांठ बांध दी जाती है , इसे ' गठबंधन ' कहा जाता है । इसका अर्थ है कि दोनों के शरीर और मन का एक होना । अब दोनों एक - दूसरे के साथ पूरी तरह से बंधे हुए हैं और उनसे यह आशा की जाती है कि वे जिन लक्ष्यों के साथ आपस में बंधे हैं , उन्हें आजीवन प्राप्त करते रहेंगे । जीवन लक्ष्य की यात्रा में वे एक - दूसरे के पूरक बनकर चलेंगे । इसीलिए गठबंधन को अटूट माना गया है । इस विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु learn more पर क्लिक करें !

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आइये जानते हैं किस राशी पर कैसा रहेगा इस संवत्सर का प्रभाव ?

हिंदू मान्यता के अनुसार प्रत्येक वर्ष चैत्र मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से नूतन संवत्सर का प्रारंभ होता है । संवत्सरों की संख्या 60 है एवं जिस प्रकार गत वर्ष में परिधावी नाम का संवत्सर था उसी प्रकार इस वर्ष प्रमाथी नाम का संवत्सर है । आइये जानते हैं किस राशी पर कैसा रहेगा इस संवत्सर का प्रभाव जानने के लिए नीचे दिए गए learn more पर क्लिक करें !

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जानिए सनातान धर्म में मंगलसूत्र का विशेष महत्व क्यों है ?

नमस्कार मित्रों,           आज हम चर्चा करेंगें एक ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य पर जिसके विषय में बहुत से लोगो ने मुझे इ-मेल्स  के माध्यम से कहा की हमारे सनातन धर्मं में  बहुत से ऐसे विषय हैं जिन्हें जानने की हमारी अभिलाषा है परन्तु उन्हें कंही भी खोजे जाने पर कोई सटीक या संतुष्टि वाला उत्तर हमे प्राप्त नहीं हो पता तो मुझसे अधिकांश लोगो द्वारा प्रश्न किया गया की हमारे सनातन धर्म से जुडी हुयी महिलाये अपने मंगलसूत्र को बड़ा महत्व देती थी परन्तु आजकल  जब से वेस्टर्न कल्चर में बढ़ावा देखने को मिला है वो प्रथा मानो विलुप्त सी हो गयी है  तो आखिर ऐसा क्या रहस्य था उस प्रथा में की महिलाएं अपने मंगल सूत्र को इतना महत्व देतीं थीं ? तो आइये जानते हैं आपके इस प्रश्न का उत्तर-  अपने इस ब्लॉग के माध्यम से पूर्ण जानकारी के लिए LEARN MORE पर क्लिक करें ।

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