Skip to content
Haridwar, Uttarakhand, 249411

Business hours

DURGA BHAWANI ASTROLOGICAL SERVICES PVT. LTD

Monday
10am-6pm
Tuesday
10am-6pm
Wednesday
10am-6pm
Thursday
10am-6pm
Friday
10am-6pm
Saturday
10am-6pm
Sunday
Not provided

You can anytime during the day with your query.

9634095016

Latest Posts & Updates

Fresh stories, announcements and offers about Consultant, straight from our business.

ऐसी मान्यता है कि मुण्डन संस्कार से शिशु का मस्तिष्क और बुद्धि दोनों ही पुष्ट होते हैं और गर्भवास…

ऐसी मान्यता है कि मुण्डन संस्कार से शिशु का मस्तिष्क और बुद्धि दोनों ही पुष्ट होते हैं और गर्भवास के मलिन संस्कारों से उसे मुक्ति मिलती है । इस संस्कार में सिर के बाल पहली बार उतारे जाते हैं ।  शिशु जब एक या तीन वर्ष का हो जाए तो उसका मुण्डन संस्कार कराया जाता है । कुल परम्परा के अनुसार पांचवें या सातवें वर्ष में भी मुण्डन संस्कार कराने का विधान है ।  आश्वलायन गृह्यसूत्र ( 1 / 17 / 2 ) के अनुसार-- तेन ते आयुषे वपामि सुश्ललोकाय स्वस्तये ।  अर्थात् मुण्डन संस्कार करने से शिशु की आयु वृद्धि होती है और वह सुन्दर व कल्याणकारी कार्यों की ओर प्रवृत्त होता है । यजुर्वेद ( 3 / 63 ) में मुण्डन या चूडाकर्म संस्कार का उल्लेख करते हुए कहा गया है  निवर्तयाम्यायुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय । रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥ अर्थात् हे शिशु ! मैं तेरी आयु - वृद्धि के लिए , तुझे अन्न ग्रहण करने में समर्थ बनाने के लिए , उत्पादन क्षमता प्रदान करने के लिए , ऐश्वर्य वृद्धि के लिए , सुन्दर सन्तान प्राप्ति के लिए , बल एवं पराक्रम प्राप्त करने के योग्य बनाने के लिए तेरा मुण्डन संस्कार करता हूं ।             ऐसा माना जाता है कि एक वर्ष से पूर्व मुंडन संस्कार कराने पर शिशु के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । मुंडन संस्कार किसी भी देवस्थल पर कराने के पीछे उद्देश्य यही रहता है कि शिशु पर सद् संस्कारों का प्रभाव पड़े । वास्तव में देखा जाए तो मुंडन संस्कार मस्तिष्क का एक प्रकार से पूजन है ।

ऐसी मान्यता है कि मुण्डन संस्कार से शिशु का मस्तिष्क और बुद्धि दोनों ही पुष्ट होते हैं और गर्भवास… post imageRead full post

क्या आप जानते हैं अन्नप्राशन से जुड़ी या महत्वपूर्ण बातें

अन्नप्राशन संस्कार के बारे में कहा गया है-- अन्नाशनान्मातगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति । अर्थात् माता के गर्भ में रहते समय शिशु में मलिन भोजन के शुद्धिकरण और शुद्ध भोजन कराने की प्रक्रिया का प्रचलन प्राचीन काल से है जो एक संस्कार के रूप में किया जाता है उसे ही अन्नप्राशन संस्कार कहते हैं । जब ' शिशु छ: - सात माह का हो चुका होता है , उस समय तक उसकी क्रिया प्रबल हो जाती है । दांत भी निकलने लगते हैं । इस अवस्था में शिशु जिस प्रकार का अन्न खाता है , उसी के अनुरूप उसका तन - मन बनता है । छांदोग्य उपनिषद् 7 / 26 / 2 में कहा गया है--- आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः । अर्थात् शुद्ध आहार के सेवन से शरीर में सत्व गुणों की वृद्धि होती है । शास्त्रों के अनुसार बालक का ६-८-१०-१२वें मास में तथा बालिका का ५-७-९वें मास में अन्नप्राशन करना चाहिये ! शास्त्रों के अनुसार अन्नप्राशन संस्कार में शुभ मुहर्त में जौ और चावल बनाकर देवताओं को अर्पण करके माता - पिता चांदी की चम्मच से शिशु को चटाते हैं ! इसके साथ ही अथर्ववेद 8 / 2 / 18 के निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण किया जाता है- शिवौ ते स्तां व्रीहयवाव बलासावदोमधो । एतौ यक्ष्मं विबाधेते एतौ मुंचतो अंहसः । । अर्थात् हे शिशु ! जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक और पुष्टिकारी हों । ये दोनों यक्ष्मानाशक और देवान्न होने से पाप को नष्ट करने वाले हैं ।

क्या आप जानते हैं अन्नप्राशन से जुड़ी या महत्वपूर्ण बातें post imageRead full post

क्यों किया जाता है निष्क्रमण संस्कार ? निष्क्रमण संस्कार का उद्देश्य क्या है ?

शिशु को जब पहली बार घर से बाहर ले जाया जाता है , उस समय सम्पन्न होने वाला कर्म विशेष निष्क्रमण संस्कार कहलाता है ।  इस सम्बन्ध में कहा गया है कि निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभिः । अर्थात् निष्क्रमण संस्कार का ध्येय शिशु को स्वास्थ्य और आयुवृद्धि कराना माना गया है । इस संदर्भ में अथर्ववेद के श्लोक 8 / 2 / 14 में कहा गया है-- शिवे तेस्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ ।  शं ते सूर्य आतप तुशं वातो वातु ते हदे ।  शिवा अभिक्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः । । अर्थात् हे शिशु ! तुम्हारे निष्क्रमण के समय ध्युलोक और पृथ्वी लोक सुखद शोभास्पद और कल्याणकारी हों । सूर्य तुम्हारे लिए कल्याणकारी आलोक प्रदान करे । तुम्हारे हृदय में स्वच्छ कल्याणकारी वायु का संचरण हो । दिव्य जल वाली पावन गंगा - यमुना आदि नदियां तुम्हारे लिए निर्मल एवं स्वादिष्ट जल वहन करने वाली हों ।

क्यों किया जाता है निष्क्रमण संस्कार ?  निष्क्रमण संस्कार का उद्देश्य क्या है ?  post imageRead full post

क्या आप जानते हैं नामकरण संस्कार से जुड़ी यह विशेषताएं

नामकरण संस्कार के संदर्भ में स्मृति संग्रह में लिखा है- आयुर्वचौऽभिवृद्धिश्च सिद्भिर्व्यवहतेस्तथा ।  नामकर्मफलं त्वेतत समद्दिष्ट मनीषिभिः । ।   अर्थात्  नामकरण संस्कार से आयु व तेज की वृद्धि होती है । व्यक्ति का लौकिक व्यवहार में अपना अलग ही अस्तित्व होता है । नामकरण के सम्बन्ध में अलग - अलग जगहों पर समय की भिन्नताए रही हैं । पराशर गृह्यसूत्र के अनुसार दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति । जन्म के दसवें दिन सूतिका का शुद्धिकरण यज्ञ कराने के बाद नामकरण संस्कार किया जाता है। नामकरण एक अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्कार है । जीवन में व्यवहार का सम्पूर्ण आधार नाम पर ही निर्भर होता है ।   नामाखिलस्य व्यवहारहेतुः शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतुः ।  नाम्नैव कीर्ति लभेत् मनुष्यस्ततः प्रशस्तं खलु नामकर्म । ।  व्यक्ति संज्ञा का जीवन में सर्वोपरि महत्व है । प्रायः बालक का नाम सम अक्षरों में रखना चाहिये । व्यवहारिक नाम दो , चार या छः अक्षर का उत्तम होता है । यश एवं मान - प्रतिष्ठा के लिये दो अक्षर , ब्रह्मचर्य तप - पुष्टि की कामना के लिये ४ अक्षर का नाम श्रेष्ठ होता है । बालक का नाम विषम अक्षर वाला न हो  तो अच्छा है । किन्तु बालिकाओं का नाम विषम अक्षर वाला श्रेष्ठ रहता है । नक्षत्र , नदी , वृक्ष , सर्प , पक्षी , सेवक सम्बन्धी एवं भयभीत करने वाले नाम न रखे जाये तो अच्छा है । नामकरण पिता या कुलश्रेष्ठ व्यक्ति द्वारा होना चाहिये । यह संस्कार ११ वें या १२ वें दिन पूर्वान्ह में करने का शास्त्र निर्देश है । सूतक समाप्ति के बाद देशकाल के अनुसार १० - १२ - १६ - १९ - २२ वें दिन नामकरण संस्कार करना चाहिये ।

क्या आप जानते हैं नामकरण संस्कार से जुड़ी यह विशेषताएं post imageRead full post

कर्णवेध संस्कार क्यों?

यह संस्कार 6 से 16 वें मास तक या विषम वर्षों में कुल की परंपरा के अनुसार । उचित आयु में किया जाता है । इसे स्त्री - पुरुषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है । क्योंकि हमारे शास्त्रों में कर्णवेध रहित पुरुष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना जाता । ब्राह्मण और वैश्य का चांदी की सुई से , शूद्र का लोहे की सुई से तथा क्षत्रिय और संपन्न पुरुषों का सोने की सुई से कर्णवेध करने का विधान है । शुभ समय में , पवित्र स्थान पर बैठकर देवताओं का पूजन करने के बाद सूर्य के सामने बालक या बालिका के कानों को निम्न मंत्र द्वारा अभिमंत्रित किया जाता है । भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः । । ( यजुर्वेद 25 / 21 ) फिर बालक के दाएं कान में पहले और बाएं कान में बाद में सुई से छेद करके कंडल पहनाएं । बालिका के पहले बाएं कान में , फिर दाएं कान में छेद करके तथा बाएं नाक में भी छेद करके आभूषण पहनाने का विधान है । मस्तिष्क के दोनों भागों को विद्युत के प्रभावों से प्रभावी बनाने के लिए नाक और कान में छिद्र करके सोना पहनना लाभकारी माना गया है । नाक में नथुनी पहनने से नासिका संबंधी रोग नहीं होते और सर्दी - खांसी से आराम मिलता है । जबकि कानों में सोने की बालियां या झुमके आदि पहनने से स्त्रियों में मासिक धर्म नियमित रहता है । और हिस्टीरिया रोग में भी लाभ होता है ।

कर्णवेध संस्कार क्यों?  post imageRead full post

जानिए 26 दिसंबर 2019 को लगने वाले सूर्य ग्रहण के विषय में पूर्ण जानकारी

दिनांक 26 दिसंबर 2019 गुरुवार पौष कृष्ण पक्ष अमावस्या को भारत के अधिकांश भागों में दिखाई देगा सूर्य ग्रहण। जो कि भारतीय समय अनुसार प्रातः 8:26 से दिन के 11:00 बजे के मध्य दिखाई देगा यह ग्रहण 2 घंटे 34 मिनट के लिए लगेगा इस ग्रहण का सूतक दिनांक 25 दिसंबर 2019 की रात्रि को 8:26 से प्रारंभ होगा ग्रहण में (सूतक ) ग्रहण के स्पर्श समय से 12 घंटे पहले लगता है ग्रहण के सूतक में बाल वृद्ध और अस्वस्थ जनों को छोड़कर शेष को भोजन स्यनादि निषेध है

जानिए 26 दिसंबर 2019 को लगने वाले सूर्य ग्रहण के विषय में पूर्ण जानकारी post imageRead full post

जानिए क्या होता है सीमन्तोन्नयन संस्कार ?

यह संस्कार गर्भ के चौथे , छठे अथवा आठवें मास में चंद्रमा के पुरुषवाची नक्षत्र पर स्थित होने पर किया जाता है , जिसका उद्देश्य गर्भपात को रोकना है । इस समय । गर्भस्थ शिशु शिक्षण योग्य बनने लगता है । उसके मन और बुद्धि में नई चेतना - शक्ति जाग्रत होने लगती है । इस समय जो सद् संस्कार डाले जाते हैं . उनका शिशु के मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि गर्भस्थ शिशु बहुत ही संवेदनशील होता है ।

जानिए क्या  होता है सीमन्तोन्नयन संस्कार ? post imageRead full post

स्त्री में गर्भ के लक्षण स्पष्ट होने पर गर्भस्थ शिशु के उचित विकास के लिए पुंसवन संस्कार किया जात…

स्त्री में गर्भ के लक्षण स्पष्ट होने पर गर्भस्थ शिशु के उचित विकास के लिए पुंसवन संस्कार किया जाता है । स्त्री के गर्भ में प्राय : तीसरे महीने से शिशु के भौतिक शरीर का निर्माण प्रारंभ हो जाता है । धर्म ग्रंथों में पुंसवन संस्कार के दो प्रमख उद्देश्य बताए गए हैं । पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति और दूसरा उद्देश्य स्वस्थ , संदर तथा गुणवान संतान की प्राप्ति । पुत्र प्राप्ति के संदर्भ में स्मृति संग्रह में लिखा है – गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्वस्य प्रतिपादनम् अर्थात् :- इस गर्भ से पुत्र ही उत्पन्न हो , इसलिए पुंसवन संस्कार किया जाता है । इस लेख को पूरा पढ़ने हेतु नीचे 👇 दिए गए लिंक पर क्लिक करें

स्त्री में गर्भ के लक्षण स्पष्ट होने पर गर्भस्थ शिशु के उचित विकास के लिए पुंसवन संस्कार किया जात… post imageRead full post

गर्भाधान संस्कार वेदों द्वारा अनुमोदित है । शिशु का भावी जीवन इसी संस्कार पर निर्भर है । इसलिए इस…

गर्भाधान संस्कार वेदों द्वारा अनुमोदित है । शिशु का भावी जीवन इसी संस्कार पर निर्भर है । इसलिए इसका बड़ा महत्व है । इस गर्भाधान संस्कार का उद्देश्य माता - पिता के शारीरिक - मानसिक दोषों से संतान को मुक्त करना है । मनुस्मृति में भी इसे बीज व क्षेत्र की शुद्धि का मुख्य कारक माना गया है । यथा- निषेकाद्वैजिकं चैनो गार्भिकञ्चापमृज्यते । क्षेत्रसंस्कार सिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम् ॥ अधिक जानकारी के प्राप्ति हेतु नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। 👇

गर्भाधान संस्कार वेदों द्वारा अनुमोदित है । शिशु का भावी जीवन इसी संस्कार पर निर्भर है । इसलिए इस… post imageRead full post

असम्भवं   हेममृगस्य  जन्मः

तथापि  रामो  लुलुभे   मृगाय | प्रायः समापन्न विपत्तिकाले धियोSपि  पुंसां मलिना भवन्ति ||  अर्थ -  प्रायः देखा गया है कि विपत्ति के समय लोगों की बुद्धि भृष्ट हो जाती  है |   इसी कारण राजा रामचन्द्र  यह  जानते हुए भी कि स्वर्णमृग का जन्म होना असम्भव है वे उसे मारने  का लालच  कर  बैठे |

असम्भवं   हेममृगस्य  जन्मः post imageRead full post