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DURGA BHAWANI ASTROLOGICAL SERVICES PVT. LTD

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श्री महालक्ष्मी पूजन दीपदान आदि के लिए प्रदोष काल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है य…

श्री महालक्ष्मी पूजन दीपदान आदि के लिए प्रदोष काल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है यदि अर्ध रात्रि काल में अमावस तिथि का अभाव हो तो प्रदोष काल में ही दीप प्रज्वलन, महालक्ष्मी पूजन, श्री गणेश एवं कुबेर आदि पूजन कृत्य का विधान है- *प्रदोषे दीपदान, महालक्ष्मी पूजन आदि विहितम ।। धर्मसिंधु* *अन्येsपि - कार्तिक कृष्ण पक्ष च प्रदोषे दीप दर्शयो:,* *नर: प्रदोष समये दीपान दद्यात मनोरमान ।। - तत्वचिन्तामणि* प्रस्तुत वर्ष कार्तिक अमावस 27 अक्टूबर, रविवार, सन 2019 ई• को प्रदोष व्यापिनी तथा रात्रि 11:32 से निशीथव्यापिनी होने से दीपावली पर्व इसी दिन होगा। दीपावली चित्रा तथा स्वाति नक्षत्र, विष्कुंभ तथा प्रीति योग तथा तुला के चंद्रमा कालीन होगी सायं सूर्यास्त (प्रदोष काल प्रारंभ) के बाद मेष व वृष लग्न एवं चित्रा नक्षत्र विद्यमान होने से यह समयावधि श्री गणेश, श्रीमहालक्ष्मी पूजन आदि कृत्यों के आरंभ के लिए विशेष रूप से प्रशस्त रहेगी। बहीखातों एवं नवीन शुभ कार्यों के लिए भी यह मुहूर्त अत्यंत शुभ होगा। रविवार की दीपावली व्यापारियों, क्रय-विक्रय करने वालों के लिए विशेष रुप से शुभ मानी जाती है। लक्ष्मी पूजन दीपदान आदि के लिए प्रदोष काल ही विशेषतया प्रशस्त माना गया है- *कार्तिके प्रदोषे तु विशेषेण अमावस्या निशावर्धके । तस्याम संपूजयेत देवी भोग मोक्ष प्रदायिनीम ।।* *श्री महालक्ष्मी पूजन मुहूर्त* 27 अक्टूबर 2019 सायं 5:28 से 8:14 तक *बही खाता पूजन* 27 अक्टूबर 2019 सांय 6:33 से 08:28 तक *महनिशिथ काल* - 27 अक्टूबर रात्रि 11:32 से 12:24 तक *दुर्गा भवानी ज्योतिष केंद्र* *ज्योतिषाचार्य जितेंद्र सकलानी* *संपर्क सूत्र:-* *9634095016*

श्री महालक्ष्मी पूजन दीपदान आदि के लिए प्रदोष काल से आधी रात तक रहने वाली अमावस श्रेष्ठ होती है य… post imageRead full post

क्या आप जानते हैं करवा चौथ पर क्यों किया जाता है चंद्रमा का पूजन

मन का देवता होने के कारण चंद्रमा मन की चंचलता , स्थिरता और प्रसन्नता को नियन्त्रित करता है । मस्तक पर भौंहों के मध्य भाग को चन्द्रमा का स्थान कहा जाता है । चन्द्रमा की प्रसन्नार्थ यहां चन्दन , रोली आदि का टीका लगाया जाता है और स्त्रियां बिन्दी लगाती हैं । करवा चौथ को चन्द्रमा की कृपा प्राप्ति हेत पहले दिन उपवास रखा जाता है और फिर रात्रि में जब चन्द्रमा उदय हो जाता है , तब अर्घ्य देकर विधिवत् उसका पूजन किया जाता है । इसके बाद ही सौभाग्यवती स्त्रियां अन्न - जल ग्रहण करती हैं । करवा चौथ के इस व्रत को मानने के पीछे धन - मान , सौभाग्य और पति की हर संकट से रक्षा मुख्य कारण माने जाते हैं । अधिक जानकारी हेतु नीचे 👇दिए गए लिंक पर क्लिक करें 🙏

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शास्त्रों में है निषेध अगरबत्ती जलाने का चलन

शास्त्रो में बांस की लकड़ी जलाना मना है फिर भी लोग अगरबत्ती जलाते है। जो की बांस की बनी होती है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है।शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धुप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती तो केमिकल से बनाई जाती है भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुश कैसे होंगे? अगरबत्ती जलाना बंद करे सब लोग। इस सत्य से यजमानो को अवगत कराये। आजकल लोगो को पितृ दोष बहुत होते है इसका एक कारण अगरबत्ती का जलना भी है।

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श्राद्ध पक्ष को लेकर लोगों के मन में आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि यह अशुभ समय होता है और इस द…

श्राद्ध पक्ष को लेकर लोगों के मन में आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि यह अशुभ समय होता है और इस दौरान कोई भी नया काम करने या फिर कोई भी नई चीज खरीदना शुभ नहीं माना जाता। ऐसा करने से पितृगण नाराज हो जाते हैं। यही वजह है कि इस धारणा के कई व्‍यापार और उद्योग धंधे पितृ पक्ष के दिनों में मंदे पड़ जाते हैं। वहीं शास्‍त्रों में भी इस बात का उल्‍लेख कहीं नहीं मिलता है कि पितृ पक्ष में खरीदारी करने से अशुभ परिणाम प्राप्‍त होते हैं। जानते हैं पितृ पक्ष को लेकर क्‍या हैं मान्‍यताएं और क्‍या कहते हैं विद्वान… अधिक जानकारी हेतु नीचे👇 दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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गणेश जी की स्थापना का शुभ मुहूर्त (Ganesh Chaturthi Shubh Muhurat 2019)

आज हम आपको आने वाली गणेश चतुर्थी से जुड़ी कुछ बातें बताने जा रहे हैं, जिनका ध्यान रखना आपके लिए बहुत आवश्यक है। कम से कम उन लोगों के लिए तो यह लेख बहुत जरूरी है जो अपने घर में गणेश जी को स्थापित करने जा रहे हैं। *2 सितंबर*  ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 2 सितंबर यानि गणेश चतुर्थी के पूरे दिन।कई शुभ संयोग बन रहे हैं। ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति से शुक्ल योग बनेगा। इतना ही नहीं सिंह राशि में चतुर्ग्रही योग भी बन रहा है। यानी सिंह राशि में सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र एक साथ हैं। ग्रहों और सितारों की इस शुभ स्थिति के कारण इस त्योहार का महत्व और शुभत्ता और अधिक बढ़ जाएगी। ग्रह-नक्षत्रों के इस शुभ संयोग में गणेश जी की स्थापना करने से सुख-समृद्धि और शांति मिलेगी।  *शुभ मुहूर्त* गणेश चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा दोपहर के समय करना शुभ माना जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न के समय हुआ था 2 सितंबर दिन सोमवार की शुरुआत हस्त नक्षत्र में होगी और गणेश जी की स्थापना चित्रा नक्षत्र में की जाएगी। मंगल के इस नक्षत्र में चंद्रमा होने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। चित्रा नक्षत्र और चतुर्थी तिथि का संयोग 2 सितंबर को सुबह लगभग 8 बजे से शुरू होकर पूरे दिन रहने वाला है। *पूजन का समय* घर में गणेश स्थापित करने और पूजन का शुभ समय अभिजीत मुहूर्त में सुबह 11.52 मिनट से लेकर दोपहर 12.43 मिनट तक करना अत्यंत शुभ रहेगा इसके अतिरिक्त भी पूरे दिन मुहूर्त शुभ ही है। *दुर्गा भवानी ज्योतिष केंद्र* *ज्योतिषाचार्य जितेंद्र सकलानी* *संपर्क सूत्र 96340 95016*

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जानिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किस ग्रह के निमित्त नगों के अभाव में कौन सी प्रामाणिक जड़िया धारण…

जानिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किस ग्रह के निमित्त नगों के अभाव में कौन सी प्रामाणिक जड़िया धारण करनी चाहिए। औषध | जड़ियां जड़ियों या वनस्पतियों की जड़ों को धारण करना रत्न धारण करने के समान ही लाभ देता है । किन्तु इन्हें विधिवत् श्रद्धापूर्वक तथा पवित्र होकर धारण करना चाहिए । इन नियमों की चर्चा हम आगे करेंगे । पहले किस ग्रह से किस वनस्पति का सम्बन्ध है यह जान लें यह सभी जानकारी प्राप्त करने हेतु नीचे 👇 दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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जानिए केतु के रत्न लहसुनिया की विशेषताएं।

केतु - लहसुनिया स्वरूप व परिचयः केतु का रत्न लहसुनिया है । इसे भारत के साहित्य में वैदूर्य , विदुररत्न , राष्ट्रक तथा बिडालाक्ष आदि नामों से पुकारा गया है । इस रत्न की चमक बिल्ली की आंख की भांति होती है । अतः इसे आंग्ल भाषा में CAT ' S EYE भी कहा जाता है । इस रत्न के मध्य एक चलती - फिरती रेखा या सूत भी बिल्ली की आंख की भाति होती है । अतः इसे ' सूत्रमणि ' भी कहा जाता है । यदि यह सूत न हो तो उस रन को । लहसुनिया न कहकर कर्केत कहते हैं । इसका रंग पीली हरी आभा वाला होता है । भूरा रंग लिया हुआ लहसुनिया भी होता है । पीला लहसुनिया जिसमें सीधी सफेद रेखा पड़ी है उत्तम माना गया है । 2½ सूत पड़ा लहसुनिया ( जो अतिदुर्लभ है ) सर्वश्रेष्ठ माना गया है । बिन्दुओं / धब्बों वाला , कांतिहीन , जाले वाला या खंडित लहसुनिया दोष युक्त होता है । अतः यह धारणीय नहीं है । केतु ग्रह के रत्न लहसुनिया के विषय में जानने के लिए नीचे👇 दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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जानिए राहु के रत्न गोमेद की विशेषताएं।

राहु - गोमेद स्वरूप व परिचयः राह का रत्न गोमेद है । गोमेद को भारतीय साहित्य में गोमेदक , बाहुरत्न , भीष्म रत्न आदि नामों से पुकारा गया है । आंग्ल भाषा में इसे ( CINNAMON STONE या HESSONITE ) कहते हैं , क्योंकि इसका रंग दालचीनी जैसा होता है । कुछ  विद्वान इसे ‘ जिरकोन ' भी कहते हैं । यह गाय के मेद के ( गोरोचन ) समान , गौमूत्र के समान अथवा शहद के समान रंग वाला , चमकीला , चिकना व कुछ भारी रत्न होता है । उत्तम गोमेद गोमूत्र के रंग व जल के समान आभा देने वाला होता है । गोमेद प्राय: चांदी में ही पहना जाता है । राहु के रत्न गोमेद के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु नीचे 👇दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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शनि - नीलम

स्वरूप व परिचयः शनि का रत्न नीलम है । अतः इसे शौरीरत्न भी कहते हैं । भारतीय वाङमय में नीलम को नीलमणि , नील , नीलाश्म या इन्द्रनील कहा गया है । आंग्ल भाषा में इसको BLUE SAPPHIRE कहते हैं । कछ लोग केवल ‘ सैफायर ' भी कहते हैं । यह प्रायः रॉयल ब्लू या हलके वायोलेट कलर में होता है । इनके अतिरिक्त नीलम का किसी और रंग का होना या पतीत होना नीलम का दोष है । कश्मीर में पाडर की खान का नीलम सर्वोत्तम माना जाता है । इसे ' मयुरनील ' भी कहते हैं , क्योंकि इसका रंग मोर की गर्दन से मिलता है । कहीं - कहीं लाल रंग की चमक वाला नीलम भी मिलता है । इसे ‘ खूनी नीलम ' कहते हैं । यह निम्न कोटि का रत्न है । सफेद झलक वाला नीलम ' ब्राह्मण , पीली झलक वाला शूद्र माना गया है । नीलम एक कांतिवान , चिकना व पारदर्शी रत्न है जो बिजली के प्रकाश में भी अपना रंग नहीं बदलता । नीलम की गिनती माणिक्य की भांति महारत्नों में होती है । नीलम में जाल या डोरा पड़ा हो तो उसे त्याग देना चाहिए । नीलम सदैव निर्दोष पहनना चाहिए । दोषयुक्त नीलम विभिन्न उपद्रव खड़े करता है तथा देश से निष्कासन व दरिद्रता लाता है । शनि ग्रह के रत्न नीलम के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने हेतु नीचे 👇 दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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जानिए शुक्र के रत्न हीरे की विशेषताएं

शुक्र - हीरा स्वरूप व परिचयः शुक्र ग्रह का रत्न हीरा है । हीरे को संस्कृत में हीरक या वज्र कहते हैं । भारतीय साहित्य में इसे अभेद्य , सायक आदि नामों से भी पुकारा गया है । आंग्ल भाषा में हीरे के लिए DIAMOND शब्द प्रयुक्त होता है । यवनों में इसे ‘ अल्माज ' भी कहते हैं । जैसा कि सभी जानते हैं कि यह समस्त रत्नों में अति कठोर तथा कार्बन का अपरूप है ( हीरे को हीरा ही काट सकता है , यह इसकी कठोरता का सही उदाहरण है । ) पौराणिक संदर्भ में हीरे की उत्पत्ति बलि दैत्य की अस्थियों से हुई है । ( दांत से मोती , रक्त से माणिक , पित्त से पन्ना , आंख से नीलम , रज से वैदूर्प , नाखून से गोमेद , मांस से मूंगा , चर्म से पुखराज आदि उत्पन्न हुए हैं । वस्तुतः रत्न पृथ्वी के विकार ही हैं । ) हीरा बहुमूल्य , पारदर्शक , कठोर , अति चमकदार , निर्मल , चिकना , सुन्दर , सूर्य किरणों का प्रसारक तथा वर्णहीन होता है तथापि कुछ हीरों में सफेद , लाल , पीली , काली , झांई भी होती है । ( रत्न - वर्ण जाति के हिसाब से ये क्रमशः ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य व शूद्र जाति के हीरे होते हैं । वैसे हीरे के तीन भेद पुरुष , स्त्री व नपुंसक माने गए हैं । कहा जाता है कि हीरा कठोर होते हुए भी बकरी के ताजे दूध या उसके खून (ताजे) में डुबो देने के बाद आसानी से टूट जाता है । हीरे का वर्तनांक सबसे अधिक है । अतः यह सबसे ज्यादा चमकता है। शुक्र ग्रह के रत्न हीरे से जुड़ी अधिक जानकारी हेतु नीचे 👇दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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भूमण्डलीय खग्रास चंद्रग्रहण

यह चंद्रग्रहण आषाढ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, शुक्रवार, दि०16/17 जुलाई 2019 को खण्डग्रास रूप में भारत में दिखाई देगा। भारतीय समयानुसार समयानुसार यह ग्रहण 16 जुलाई 2019 को रात्रि 1:37 से रात्रि 4:32 बजे के मध्य दिखाई देगा । इस ग्रहण का सूतक दिनांक 16/07/2019 को शाम 4:37 बजे से प्रारम्भ होगा । चन्द्रग्रहण का सुतक ग्रहण के स्पर्श समय से 9 घंटे पहले लगता है । ग्रहण के सूतक में बच्चों को, वृद्ध और अस्वस्थ्यजनों को छोड़कर शेष को भोजन - शयन आदि नहीं करना चाहिए । ग्रहण स्पर्श - 1:37 बजे रात्रि ग्रहण मध्य 3:05 बजे रात्रि ग्रहण मोक्ष - 4:32 बजे रात्रि ( पूर्णकाल - 2 घंटा / 55 मिनट ) ग्रहण फल- यह चंद्रग्रहण आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा मंगलवार दि० 16 जुलाई 2019 उत्तराषाढा नक्षत्र के धनुरातिगत चन्द्रमा में घटित होगा । जानिए किन-किन राशियों पर पड़ेगा चंद्रग्रहण का कैसा प्रभाव! ग्रहण काल में क्या करें और क्या ना करें। इन सभी बातों की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करने के लिए नीचे 👇दिए गए लिंक पर क्लिक करें

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