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भजन - कीर्तन और प्रार्थना क्यों की जाती है ?

भजन - कीर्तन और प्रार्थना क्यों की जाती है ?

हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि-

भजनस्य लक्षणं रसनम् अर्थात् अंतरात्मा का रस जिसमें उभरे , उसका नाम है - भजन । हृदय में जो आनंद वस्तु , व्यक्ति या भोज - सामग्री के बिना भी आता है . वही भजन का रस है । 

रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने कहा है कि जो साधक भगवान् का विश्वास पाने के लिए भजन करता है , प्रभु अपनी अहैतुकी कृपा से उसे अपना विश्वास प्रदान करके उसके जीवन को सफल कर देते हैं । 

पद्मपुरण के उत्तरखंड में कहा गया है-

नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च । 

मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद ।

 ( पद्मपुराण / उत्तराखंड 14/23 ) 

अर्थात्  हे नारद ! मैं न तो बैकुंठ में ही रहता हूं और न योगियों के हृदय में ही रहता हूं । मैं तो वहीं रहता हूं , जहां प्रेमाकुल होकर मेरे भक्त मेरे नाम का कीर्तन किया करते हैं । 

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भजन - कीर्तन और प्रार्थना क्यों की जाती है ?