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DURGA BHAWANI ASTROLOGICAL SERVICES PVT. LTD

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चार युग_और_उनकी विशेषताएं

आज के आधुनिक युग में आपने बहुत बार सनातन धर्म की चर्चा को सुना होगा एवं उस चर्चा के दौरान जाना होगा कि चार प्रकार के युग होते हैं और उन्हीं युगों में यह कलयुग चल रहा है कलयुग में पाप की वृद्धि होती है एवं लोग ईश्वर पर आस्था रखना कम कर देते हैं परंतु क्या आपने कभी सोचा है कि जब सतयुग रहा होगा या अन्य कोई युग रहा होगा तो उस समय मानव जीवन किस प्रकार का होता होगा? वह युग कितने वर्ष के होते होंगे? उस समय मनुष्य की आयु कितनी होती होगी? आदि आदि। मेरे दिमाग में तो यह प्रश्न बार-बार ही आते हैं और मुझे आशा है कि आप के मस्तिष्क में भी यह प्रश्न कभी ना कभी तो जरूर आते होंगे । पहले के राजा महाराजा लोग सोने चांदी के बर्तनों में खाना खाया करते थे ऐसे सुनने को मिलता है तो आखिर इस चीज का क्या कारण है कि उन्हें इन बर्तनों में खाना खाना पड़ता था और क्यों वह प्रचलन अब समाप्ति की ओर हो गया । तो आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ प्रश्नों का उत्तर इस ब्लॉग के माध्यम से learn more बटन पर क्लिक कर के

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शुभ कर्म पूर्वाभिमुख होकर क्यों किए जाते हैं ?

सूर्योदय पूर्व दिशा में होता है और उदित होते सूर्य की किरणों का मानव पर प्रभाव निश्चय ही पड़ता है । इसका वैज्ञानिक महत्व भी है । अर्थवेद ( 17/1/30 ) में कहा गया है कि उद्यन्त्सूर्योनुदतां मृत्युपाशान्।अर्थात् उदित होते सूर्य में मृत्यु के सभी कारणों विकारादि को नष्ट करने की क्षमता है । अथर्ववेद ( 5/30/15 ) में आया है कि सूर्यस्त्वाधिपतिर्मृत्यो रुदायच्छतु रश्मिभिः । अर्थात् मृत्यु के पाश को काटने के लिए सूर्य के प्रकाश से सम्पर्क बनाओ । अथर्ववेद ( 8/14 ) में आया है कि मृत्योः पड्वीशं अवमुंचमानः । माच्छित्था आत्माल्लोकादग्नेः सूर्यस्य संदृशः ।। अर्थात् सूर्य के प्रकाश में रहना अमृतलोक में रहने के समान है । सूर्य को साक्षात् नारायण का प्रतीक माना गया है । सूर्य ही ब्रह्मा के समान एकमात्र ऐसे देव हैं , जिनके पूजन - अर्चन का प्रत्यक्ष फल प्राप्त होता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं । इस विषय में और अधिक जानने के लिए learn more बटन पर क्लिक करें !

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गंगा नदी अति पावन क्यों हैं ?

नमस्कार मित्रों , मैं जितेन्द्र सकलानी एक बार पुन: प्रस्तुत हुआ हूँ आप लोगो के समक्ष अपने नए ब्लॉग के साथ अपने धर्मग्रंथो पर आधारित कुछ बताये गए वाक्य, अथवा नियमो के विषय में कुछ जानकरी लेकर.... आपने अपने बड़े बुजुर्गों को कई बार कहते सुना होगा की वह किसी पवित्र तीर्थ में जाकर गंगा स्नान करके आना चाहते है या अन्य जगह आपको सुनने को मिला होगा की गंगा नदी बड़ी ही पावन नदी हैं क्यूँ की गंगा नदी को भारत वर्ष में ही नहीं अपितु समस्त संसार में बड़ा ही पवित्र मन गया हैं परन्तु क्या आपने कभी सोचा है की ऐसा क्यूँ ? तो आपके इस प्रश्न का उत्तर लेकर मैं पुन: प्रस्तुत हुआ हूँ अपने ब्लॉग के माध्यम से ब्लॉग को पूरा पढने के लिए learn more बटन पर क्लिक करें

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हनुमान जी को सिन्दूर क्यों चढाते हैं ?

नमस्कार मित्रों , मैं जितेन्द्र सकलानी एक बार पुन: प्रस्तुत हुआ हूँ आप लोगो के समक्ष अपने नए ब्लॉग के साथ अपने धर्मग्रंथो पर आधारित कुछ बताये गए वाक्य, अथवा नियमो के विषय में कुछ जानकरी लेकर.... आप में से बहुत से लोग हनुमान बाबा को चोला चढ़ाने जरूर जाते हैं परंतु क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है? ऐसी किस घटना से इसका संबंध हो सकता है जिसके कारण हनुमान जी को सिंदूर इतना प्रिय हो गया? आपके इन्हीं प्रश्नों का उत्तर लेकर आज मैं आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत हुआ हूं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से तो आइए जानते हैं- इस ब्लॉग को पढने के लिए learn more बटन पर क्लिक करें !

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तिलक क्यों लगाते है ?

तिलक , त्रिपुंड्र , टीका और बिंदिया आदि का सम्बन्ध मस्तिष्क से है । इसीलिए तिलकादि मस्तक ( ललाट ) के मध्य भाग में लगाएं जाते हैं । कठोपनिषद् में तिलक लगाने के सम्बन्ध में बताया गया है कि मस्तक के ठीक मध्य एक प्रमुख नाड़ी सुषुम्ना है । इसी नाड़ी से ऊर्ध्वगतीय मोक्ष मार्ग निकलता है । अन्य नाड़ियां निकलने के बाद प्राय : शरीर में चारों ओर फैल जाती हैं , जबकि सुषुम्ना का मार्ग ऊर्ध्व की ओर ही रहता है । प्रत्येक व्यक्ति के मस्तक पर सुषुम्ना नाड़ी का ऊर्ध्व भाग एक गहरी रेखा के रूप में दिखाई देता है । सुषुम्ना नाड़ी को केंद्र में मानकर ही भृकुटि और ललाट के मध्य भाग में तिलक लगाया जाता है । तिलक किए बिना स्नान , होम , तप , देव - पूजन , पितृकर्म और दान आदि पुण्य कर्मों का फल भी व्यर्थ हो जाता है । तिलक के महत्व तथा प्रकारों को समझने के लिए learn more बटन पर क्लिक करे

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प्राणायाम आज के समय में आवश्यक क्यों है ?

प्राणायाम के अभ्यास प्राणायाम अष्टांग योग का एक महत्त्वपूर्ण अंग है जिसका शाब्दिक अर्थ है - प्राणों का आयाम । महर्षि पतंजलि के मतानुसार - तस्मिन् सति श्वास - प्रश्वासयोर्गतिर्विच्छेदः प्राणायामः अर्थात् श्वास - प्रश्वास की गति का विच्छेद करके प्राणवायु को सीने में भरने , भीतर रोककर रखने और उसे बाहर छोड़ने का नियमन करने की क्रिया को प्राणायाम कहते हैं । क्या है हमारे जीवन में प्राणायाम का महत्व जानने के लिए learn more बटन पर क्किच्क करें

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पारद शिवलिंग के पूजन - दर्शन का महत्व क्यों ?

पारद अर्थात् पारा शिव के वीर्य ( शुक्र ) से उत्पन्न माना गया है । इसीलिए शास्त्रों में इसे साक्षात् शिव - स्वरूप माना गया है और इसकी महिमा गाई गई है । वाग्भट्ट के विचारानुसार जो कोई पारद शिवलिंग का श्रद्धा - भक्तिपूर्वक पूजन करता है , उसे तीनों लोकों के शिवलिंगों के पूजन का फल मिलता है । इसके दर्शनमात्र से सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ , करोड़ों गोदान एवं हजारों स्वर्ण मुद्राओं के दान का फल मिलता है । जिस घर में नित्य विधिवत् पारद शिवलिंग का पूजन होता है , वहां सुख - समृद्धि रहती है । ऋद्धि - सिद्धि वहां वास करती हैं और साक्षात् शिव वहां विराजते हैं । और क्या-क्या हैं पारद शिवलिंग के महत्व ? कैसे करें जांच पारद असली है या नकली ? जानने के लिए learn more बटन पर क्लिक करें एवं ब्लॉग को पूरा अवश्य पढ़ें !

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शालिग्राम पूजन क्यों किया जाता है ?

शालिग्राम नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाया जाने वाला काले रंग का एक पत्थर है । यह चिकना और अण्डाकार होता है । इस पर शंख , चक्र , गदा अथवा पद्म बने होते हैं । कुछ शालग्राम पत्थर के ऊपर सफेद रंग की चक्राकार धारियां होती है । भगवान विष्णु के रूप में इसकी पूजा की जाती है । स्कंदपुराण के कार्तिक माहात्म्य में शालिग्राम के महत्त्व का वर्णन स्वयं शिव ने किया है । प्रत्येक कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराती हैं और नवीन वस्त्र एवं जनेऊ अर्पित करती हैं । हिन्दू परिवारों में तुलसी और शालिग्राम के विवाह के बाद ही विवाहोत्सव आरम्भ होते हैं । ' पुराणों के अनुसार जिस घर शालग्राम न हो , वह घर श्मशान होता है । इस ब्लॉग को पूरा पढने के लिए learn more बटन पर क्लिक करें

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पीपल वृक्ष का पूजन क्यों ?

तैत्तरीय संहिता के अनुसार सात पवित्र वृक्षों में से पीपल भी एक है । ब्रह्मवैवर्तपुराण में पीपल की पवित्रता के संदर्भ में काफी कुछ वर्णित है । स्कंद पुराण के अनुसार पीपल की जड़ में विष्णु , तने में केशव , शाखाओं में नारायण , पत्तों में भगवान हरि और फल में सब देवताओं के साथ भगवान अच्युत का निवास है । इस ब्लॉग को पूरा पढने हेतु learn more बटन पर क्लिक करें

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क्या आपने भी मोती नग धारण किया हुआ है क्या है उस मोती नग के आपके लिए फायदे एवं नुकसान जानने के लि…

क्या आपने भी मोती नग धारण किया हुआ है क्या है उस मोती नग के आपके लिए फायदे एवं नुकसान जानने के लिए इस वीडियो को पूरा अवश्य देखिए दिए गए लिंक पर क्लिक करके

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मंदिर का निर्माण अत्यावश्यक क्यों ?

नमस्कार मित्रों , मैं जितेन्द्र सकलानी एक बार पुन: प्रस्तुत हुआ हूँ आप लोगो के समक्ष अपने नए ब्लॉग के साथ अपने धर्मग्रंथो पर आधारित कुछ बताये गए वाक्य, अथवा नियमो के विषय में कुछ जानकरी लेकर.... आज कल के घटनाकर्म को देखते हुए आप लोगो को भी सुनने में आ रहा होगा की कुछ मंदबुद्धि अपने स्वछंद विचारों को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं की वह ना केवल आस्था के उद्देश्य से अपितु धर्मभाव के न्याय से भी अनैतिक ही माना जायेगा उन मूढ मतियों का कहना है की मंदिर सर्वदा के लिए बंद हो जाने चहिए ! मंदिर बंद कर देने से भी क्या होगा वह सर्वव्यापी परमात्मा तो सभी जगह व्याप्त है ! और जिन्होंने मंदिरों के निर्मांण की नीभ रखी वो हमारे पूर्वज भक्ति और श्रद्धा में , नियमों में हमसे कई गुणा जागरूक भी थे तो उन्होंने मंदिरों का निर्मांण किया ही क्यूँ ? ऐसे ही प्रश्नों का जवाब मैंने इस ब्लॉग में अपने मतानुसार लिखा है - इस ब्लॉग को पढने के लिए learn more बटन पर क्लिक करें

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गणेशजी को कैथ - जामुन , दूर्वा क्यों चढ़ाते हैं ! गणेशजी का वाहन मूषक ही क्यों ?

गणेशजी के सम्बन्ध में शतमोदकप्रिय की उक्ति प्रचलित है । इस उक्ति का अर्थ है कि एक बार में सो लड्डू खा जाना गणेशजी को भाता है । उनका प्रिय व्यंजन मिष्ठान होने के कारण वे गुड़ और मोदक का अधिक सेवन करते हैं । मोदक के अभाव में गणेश पूजन भी अधूरा माना जाता है । अधिक मीठा खाने से मधुमेह रोग हो जाता है , जिसकी निवृति हेतु दूब , कैथ और जामुन उपयोगी हैं । क्यूँ है उन्हें यह सब अति प्रिय जानने के लिए learn more बटन पर क्लिक करें !

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