जानिए सनातन धर्मानुसार नित्य पूजा पाठ क्यों ?
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श्रीमद्भगवद् गीता ( 18 / 46 ) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव: अर्थात् सद्कर्म से मनुष्य भगवान की पूजा कर मुक्ति प्राप्त करता है । अपने अन्तर्मन की गहराइयों से अपने इष्टदेव के प्रति समर्पण भाव रखते हुए उसका स्मरण करना और निर्धारित पूजा सामग्री का उपयोग करना पूजा कहलाता है । पूजा में समर्पण भाव आवश्यक है ।
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